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वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 क्या है? पूरा इतिहास, उद्देश्य, प्रावधान और प्रभाव

वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 क्या है? पूरा इतिहास, उद्देश्य, प्रावधान और प्रभाव
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 ब्रिटिश भारत का वह महत्वपूर्ण कानून था जिसने भारतीय भाषाओं में छपने वाले अखबारों की स्वतंत्रता को सीधे निशाना बनाया। इसे गैगिंग एक्ट भी कहा जाता है। लॉर्ड लिटन के शासनकाल में 14 मार्च 1878 को पारित इस अधिनियम ने भारतीय प्रेस इतिहास में एक काला अध्याय जोड़ा। अगर आप वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 का उद्देश्य, प्रावधान, विरोध, प्रभाव और उससे जुड़े अन्य ब्रिटिश कानूनों के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है।
यह लेख पत्रकारिता के इतिहास को सरल, तथ्यात्मक और व्यवस्थित तरीके से समझाने के लिए लिखा गया है।
विषय सूची (Table of Contents)
1.वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 की पृष्ठभूमि
2.लॉर्ड लिटन का शासनकाल और अधिनियम
3.वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 के उद्देश्य
4.अधिनियम पारित होने के मुख्य कारण
5.वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 के प्रमुख प्रावधान
6.उल्लंघन करने पर क्या सजा होती थी
7.किन भाषाओं पर लागू हुआ यह कानून
8.उस समय के प्रमुख अखबार
9.किन लोगों और संगठनों ने विरोध किया
10.अधिनियम का प्रभाव और निरसन
11.इसके बाद आए अन्य ब्रिटिश प्रेस कानून
12.अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

निष्कर्ष
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 की पृष्ठभूमि
1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन ने भारतीय प्रेस पर नजर रखना शुरू कर दिया था। यूरोपीय अखबार आमतौर पर सरकार का समर्थन करते थे, जबकि भारतीय भाषाओं के अखबार सरकारी नीतियों की आलोचना करने लगे।
1876-78 का महान अकाल, 1877 का दिल्ली दरबार और द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध (1878-80) ने भारतीय भाषा के अखबारों में तेज आलोचना पैदा की। लाखों लोग भूख से मर रहे थे, फिर भी दिल्ली दरबार पर भारी खर्च किया गया और अफगान युद्ध के लिए भारतीय करदाताओं का पैसा इस्तेमाल हुआ। इन घटनाओं की आलोचना को ब्रिटिश सरकार ने राजद्रोही लेखन माना।
इसी पृष्ठभूमि में वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 लाया गया। इसका आधिकारिक नाम था – “ओरिएंटल भाषाओं में प्रकाशनों के बेहतर नियंत्रण के लिए अधिनियम”।
लॉर्ड लिटन का शासनकाल और अधिनियम
यह अधिनियम लॉर्ड लिटन (वायसराय 1876-1880) के शासनकाल में पारित हुआ। लॉर्ड लिटन की साम्राज्यवादी नीतियों के कारण उन्हें भारतीय इतिहास में विवादास्पद वायसराय माना जाता है। दिल्ली दरबार, अकाल प्रबंधन और अफगान युद्ध उनके कार्यकाल की प्रमुख घटनाएँ रहीं। वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 उनके शासन की सबसे अलोकप्रिय कार्रवाइयों में से एक था।
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 के उद्देश्य
इस अधिनियम के मुख्य उद्देश्य थे:
भारतीय भाषाओं में छपने वाले अखबारों की आलोचना को दबाना
राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार को रोकना
आम जनता तक पहुँचने वाली खबरों पर सरकारी नियंत्रण रखना
अंग्रेजी अखबारों को मुक्त रखते हुए केवल भारतीय प्रेस को निशाना बनाना
सरकार चाहती थी कि यूरोपीय और शिक्षित वर्ग तक सीमित आलोचना रहे, जबकि आम लोगों तक पहुँचने वाली आवाज को चुप करा दिया जाए।
अधिनियम पारित होने के मुख्य कारण
1876-78 के अकाल की सरकारी नीतियों की आलोचना
दिल्ली दरबार पर भारी खर्च
द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध का आर्थिक बोझ
भारतीय भाषा के अखबारों में बढ़ती राष्ट्रवादी भावना
आयरलैंड के प्रेस कानूनों से प्रेरित होकर भारतीय प्रेस को नियंत्रित करने की कोशिश
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 के प्रमुख प्रावधान
अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधान इस प्रकार थे:
यह केवल भारतीय भाषाओं (वर्नाकुलर) के अखबारों पर लागू होता था। अंग्रेजी अखबार इससे पूरी तरह मुक्त थे।
जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस कमिश्नर प्रिंटर और प्रकाशक से बॉन्ड पर हस्ताक्षर करवा सकते थे।
बॉन्ड में यह वचन होता था कि सरकार के खिलाफ असंतोष या सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने वाला कोई लेख नहीं छापा जाएगा।
सुरक्षा जमा (सिक्योरिटी डिपॉजिट) जमा कराना अनिवार्य हो सकता था।
उल्लंघन पर सुरक्षा जमा जब्त की जा सकती थी।
बार-बार उल्लंघन पर प्रेस मशीन, टाइप और सामग्री जब्त की जा सकती थी।
मजिस्ट्रेट का निर्णय अंतिम होता था। अदालत में अपील का कोई अधिकार नहीं था।
पूर्व-सेंसरशिप का विकल्प भी उपलब्ध था।
ये प्रावधान इतने कठोर थे कि कई अखबारों को या तो बंद होना पड़ा या भाषा बदलनी पड़ी।
उल्लंघन करने पर क्या सजा होती थी
पहली बार उल्लंघन पर चेतावनी दी जाती थी। फिर सुरक्षा जमा जब्त की जाती थी। दोबारा उल्लंघन पर प्रेस की मशीनरी और सामग्री जब्त कर ली जाती थी। कुछ मामलों में जुर्माना या कारावास भी संभव था। सबसे बड़ी बात यह थी कि इन कार्रवाइयों के खिलाफ अदालत में जाने का अधिकार नहीं था।
किन भाषाओं पर लागू हुआ यह कानून
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 बंगाली, हिंदी, उर्दू, मराठी, गुजराती, तमिल और अन्य भारतीय भाषाओं पर लागू होता था। अंग्रेजी भाषा के अखबार पूरी तरह बाहर रखे गए थे। यही भेदभाव अधिनियम की सबसे बड़ी आलोचना का कारण बना।
उस समय के प्रमुख अखबार
उस समय अमृत बाजार पत्रिका, सोम प्रकाश, संजीवनी, सहचर, भारत मिहिर और ढाका प्रकाश जैसे अखबार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। अमृत बाजार पत्रिका ने अधिनियम लागू होने से ठीक पहले रातोंरात अपनी भाषा अंग्रेजी कर ली ताकि वह इस कानून से बच सके। कुछ अखबारों ने बंद होना पसंद किया।
किन लोगों और संगठनों ने विरोध किया
सुरेंद्रनाथ बनर्जी द्वारा स्थापित इंडियन एसोसिएशन ने बड़े पैमाने पर विरोध किया। कलकत्ता में जनसभाएँ आयोजित की गईं। भारतीय बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और शिक्षित वर्ग ने इसे नस्लीय भेदभाव बताया। ब्रिटेन में भी विलियम ग्लैडस्टोन जैसे नेताओं ने इसकी आलोचना की।
अधिनियम का प्रभाव और निरसन
अल्पकाल में कई अखबार चुप हो गए, लेकिन लंबे समय में यह अधिनियम राष्ट्रवादी चेतना को बढ़ाने वाला साबित हुआ। 1880 में लॉर्ड रिपन वायसराय बने। उन्होंने 1882 में वर्नाकुलर प्रेस एक्ट को निरस्त कर दिया। निरसन को प्रेस स्वतंत्रता की महत्वपूर्ण जीत माना गया।
इसके बाद आए अन्य ब्रिटिश प्रेस कानून
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 के बाद भी प्रेस पर नियंत्रण जारी रहा। महत्वपूर्ण कानून थे:
समाचार पत्र (अपराधों को उकसाने) अधिनियम 1908
भारतीय प्रेस अधिनियम 1910
धारा 124ए (राजद्रोह) का व्यापक इस्तेमाल
रक्षा अधिनियम और रॉलेट एक्ट में प्रेस संबंधी प्रतिबंध
ये कानून दिखाते हैं कि 1878 का अधिनियम केवल शुरुआत था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 कब पारित हुआ?
उत्तर: 14 मार्च 1878 को।
प्रश्न 2: वर्नाकुलर प्रेस एक्ट किसने पारित किया?
उत्तर: लॉर्ड लिटन ने।
प्रश्न 3: वर्नाकुलर प्रेस एक्ट को गैगिंग एक्ट क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि इसने भारतीय भाषा के अखबारों की आवाज को दबाने का काम किया।
प्रश्न 4: वर्नाकुलर प्रेस एक्ट कब निरस्त हुआ?
उत्तर: 1882 में लॉर्ड रिपन ने इसे निरस्त किया।
प्रश्न 5: अमृत बाजार पत्रिका ने क्या किया?
उत्तर: अधिनियम से बचने के लिए उसने रातोंरात अपनी भाषा अंग्रेजी कर ली।
निष्कर्ष
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 भारतीय प्रेस इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह बताता है कि सत्ता कब और कैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने का प्रयास करती है। यह अधिनियम भेदभावपूर्ण था, न्यायिक समीक्षा से मुक्त था और आम लोगों की आवाज दबाने के लिए बनाया गया था। फिर भी इससे प्रेस की शक्ति और राष्ट्रवादी चेतना दोनों बढ़ी।
आज के पत्रकारिता के छात्रों और आम पाठकों के लिए यह इतिहास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हम सीखते हैं कि प्रेस की स्वतंत्रता किसी समाज की लोकतांत्रिक सेहत का पैमाना होती है।
यह लेख ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है और शैक्षिक उद्देश्य से लिखा गया है।
UGC NET के लिए अतिरिक्त PYQ (Previous Year Questions)

कालानुक्रमिक क्रम में (घटनाओं और प्रश्नों के आधार पर)
नीचे UGC NET (Mass Communication & Journalism तथा History) में पूछे गए या पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं। प्रत्येक प्रश्न के साथ उत्तर और व्याख्या है।

1. वर्नाकुलर प्रेस एक्ट कब पारित हुआ?
उत्तर: 1878
व्याख्या: 14 मार्च 1878 को लॉर्ड लिटन के शासनकाल में पारित हुआ। यह अधिनियम भारतीय भाषाओं के अखबारों को नियंत्रित करने के लिए लाया गया था।

2. वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 को किस अन्य नाम से जाना जाता है?
उत्तर: गैगिंग एक्ट (Gagging Act)
व्याख्या: UGC NET Mass Communication 2017 में यह प्रश्न पूछा गया था। इसे गैगिंग एक्ट इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसने भारतीय भाषा के अखबारों की आवाज को दबाने का काम किया।

3. वर्नाकुलर प्रेस एक्ट किस वायसराय के काल में लागू किया गया?
उत्तर: लॉर्ड लिटन
व्याख्या: लॉर्ड लिटन (1876-1880) ने इसे पारित किया। उनका शासनकाल अकाल, दिल्ली दरबार और अफगान युद्ध के लिए विवादास्पद रहा।

4. वर्नाकुलर प्रेस एक्ट मुख्य रूप से किस पर लागू होता था?
उत्तर: भारतीय भाषाओं (वर्नाकुलर) में छपने वाले अखबारों पर
व्याख्या: अंग्रेजी अखबार इससे पूरी तरह मुक्त थे। यही भेदभाव इसकी सबसे बड़ी आलोचना का कारण बना।

5. वर्नाकुलर प्रेस एक्ट के अंतर्गत अपील का अधिकार था या नहीं?
उत्तर: नहीं, मजिस्ट्रेट का निर्णय अंतिम था
व्याख्या: जिला मजिस्ट्रेट का फैसला अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। यह अधिनियम को अत्यधिक दमनकारी बनाता था।

6. अमृत बाजार पत्रिका ने अधिनियम से बचने के लिए क्या किया?
उत्तर: रातोंरात अपनी भाषा अंग्रेजी कर ली
व्याख्या: अधिनियम लागू होने से ठीक पहले अमृत बाजार पत्रिका ने भाषा बदलकर अंग्रेजी कर दी, ताकि वह कानून के दायरे से बाहर रह सके।

7. वर्नाकुलर प्रेस एक्ट को किसने निरस्त किया?
उत्तर: लॉर्ड रिपन
व्याख्या: 1882 में लॉर्ड रिपन ने इसे निरस्त कर दिया। यह प्रेस स्वतंत्रता की महत्वपूर्ण जीत मानी जाती है। (कुछ स्रोतों में 1881 भी लिखा मिलता है, लेकिन अधिकांश मानक स्रोतों में 1882 है।)

8. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 के बारे में सही है?
(I) यह भेदभावपूर्ण था क्योंकि अंग्रेजी अखबार इसके दायरे से बाहर थे।
(II) मजिस्ट्रेट के निर्णय के खिलाफ अदालत में अपील का प्रावधान नहीं था।
(III) सोम प्रकाश जैसे अखबारों पर कार्रवाई हुई।
उत्तर: सभी तीनों सही हैं।
व्याख्या: यह अधिनियम नस्लीय भेदभाव पर आधारित था और कार्यपालिका को अत्यधिक शक्ति देता था।

9. वर्नाकुलर प्रेस एक्ट के बाद कौन-से महत्वपूर्ण प्रेस कानून आए?
उत्तर:
समाचार पत्र (अपराधों को उकसाने) अधिनियम, 1908
भारतीय प्रेस अधिनियम, 1910
व्याख्या: 1878 का अधिनियम निरस्त होने के बाद भी प्रेस पर नियंत्रण जारी रहा। 1908 और 1910 के कानूनों में सुरक्षा जमा और प्रेस जब्ती के प्रावधान फिर से लाए गए।

10. कालानुक्रमिक क्रम में सही घटनाएँ चुनें:
(A) वर्नाकुलर प्रेस एक्ट
(B) लॉर्ड रिपन द्वारा निरसन
(C) भारतीय प्रेस अधिनियम 1910
उत्तर: A → B → C
व्याख्या: 1878 में अधिनियम आया → 1882 में निरस्त → 1910 में नया प्रेस अधिनियम आया।

प्रशांत घुवारा ऑनलाइन
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